भगवान विष्णु के 6वें अवतार: भगवान परशुराम
आज परशुराम जयंती पर विशेष
भगवान परशुराम भगवान विष्णु के 6वें अवतार थे जिन्होंने इसे क्रूर क्षत्रियों के अत्याचारों से बचाने के लिए पृथ्वी पर जन्म लिया। जिस दिन परशुराम अवतरित हुए थे उस दिन को परशुराम जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह दिन देश के अधिकांश हिस्सों में अक्षय तृतीया के रूप में भी प्रसिद्ध है और मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को परशुराम जयंती मनाई जाती है।
शास्त्रों और हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान परशुराम के जन्म से संबंधित दो कहानियां हैं। हरि वंश पुराण के अनुसार, कार्तवीर्य अर्जुन नाम का एक राजा था जो महिष्मती नागरी पर शासन करता था। वह और अन्य क्षत्रिय कई विनाशकारी कार्यों में लिप्त थे, जिससे अन्य प्राणियों का जीवन कठिन हो गया। इस सबसे व्यथित होकर, देवी पृथ्वी ने भगवान विष्णु से पृथ्वी और जीवित प्राणियों को क्षत्रियों की क्रूरता से बचाने के लिए सहायता मांगी। देवी पृथ्वी की मदद करने के लिए, भगवान विष्णु ने परशुराम के नाम से रेणुका और जमदग्नि के पुत्र के रूप में अवतार लिया और कार्तवीर्य अर्जुन तथा सभी क्षत्रियों का पृथ्वी से उनकी हिंसा और क्रूरता से मुक्त करने के लिए वध कर दिया।
ब्राह्मण कुल में हुआ जन्म
भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। उनके जन्म के समय आकाश मंडल में छह ग्रहों का उच्च योग बना हुआ था। तब उनके पिता और सप्त ऋषि में सम्मिलित ऋषि जमदग्नि को पता चल गया था कि उनका बालक बेहद पराक्रमी होगा।
परशुराम ने किया सहस्त्रार्जुन का वध
हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन ने अपने बल और घमंड के कारण लगातार ब्राह्राणों और ऋषियों पर अत्याचार कर रहा था। सहस्त्रार्जुन अपनी सेना सहित भगवान परशुराम के पिता जमदग्रि मुनि के आश्रम में पहुंचा। जमदग्रि मुनि ने सेना का स्वागत और खान पान की व्यवस्था अपने आश्रम में की। मुनि ने आश्रम की चमत्कारी कामधेनु गाय के दूध से समस्त सैनिकों की भूख शांत की। कामधेनु गाय के चमत्कार से प्रभावित होकर उसके मन में लालच पैदा हो गया। इसके बाद जमदग्रि मुनि से कामधेनु गाय को उसने बलपूर्वक छीन लिया। जब यह बात परशुराम को पता चली तो उन्होंने सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया।
21 बार किया था धरती से क्षत्रिय वंश का विनाश
सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने बदला लेने के लिए परशुराम के पिता का वध कर दिया और पिता के वियोग में भगवान परशुराम की माता चिता पर सती हो गयीं। पिता के शरीर पर 21 घाव को देखकर परशुराम ने प्रतिज्ञा ली कि वह इस धरती से समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर देंगे। इसके बाद पूरे 21 बार उन्होंने पृथ्वी से क्षत्रियों का संहार कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।
परशुराम और गणपति महाराज के बीच हुआ युद्ध
भगवान परशुराम को क्रोध भी अधिक आता था। उनते क्रोध से स्वयं गणपति महाराज भी नहीं बच पाए थे। एकबार जब परशुराम भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कैलाश पहुंचे, तो गणेश जी ने उन्हें उनसे मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर उन्होंने अपने शस्त्र से भगवान गणेश जी का एक दांत तोड़ डाला। इस कारण से भगवान गणेशजी एकदंत कहलाने लगे।
सात चिरंजीवी देवों में से एक
भगवान विष्णु के अवतार परशुराम सात चिरंजीवी देवों में से एक माने जाते हैं। इसीलिए हिंदू मान्यताओं के अनुसार सात चिरंजीवी देवों में से एक परशुराम आज भी पृथ्वी पर ही हैं। यही कारण है कि अवतार होते हुए भी उन्हें राम या श्रीकृष्ण की तरह नहीं पूजा जाता है। हालांकि दक्षिण भारत के पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में भगवान परशुराम के कई प्रसिद्ध मंदिर है। कल्कि पुराण के अनुसार अभी भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि का होना शेष है, जिनके युद्ध कला के गुरु होंगे भगवान परशुराम। जन्म के समय परशुराम का नाम राम था किंतु जब उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की और शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें तरह-तरह के अस्त्र भेंट किए, तो उनका परशु यानी फरसा राम को बहुत प्रिय हुआ और अंतत: यह उनके नाम के साथ जुड़ गया, जिसके फलस्वरूप ये परशुराम कहलाए।
संकलनकर्ता: कमल शर्मा, रायगढ़ (छग)

