तन स्वस्थ योग से-मन स्वस्थ संगीत से–लोकगायक दीपक आचार्य
रायगढ़/ 21 जून को विश्व संगीत दिवस एवम योग दिवस को एक ही दिन मनाया जाना ही ये प्रदर्शित करता है क्योंकि “तन स्वस्थ योग से-मन स्वस्थ संगीत से” संगीत और योग दोनो एक दूसरे के पूरक है एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, मन और तन की स्वस्थता के लिए संगीत और योग की भूमिका अद्वितीय है,मेरे लिये संगीत ईश्वर का दिया हुई सबसे बड़ा तोहफा और धन है,क्योकि आज मुझमें संगीत की एक बूंद का ज्ञान भी है तो वह उसी परमब्रह्म का माँ सरस्वती का और अपने माता पिता का दिया हुआ है, जिसमे मेरे परिवार ने भी मुझे खूब हौसला दिया है।मैने संगीत की डिग्री बहुत बाद में लिया जिसमे लोकगायन में खैरागढ़ से डिप्लोमा किया साथ ही भावसंगीत में विशारद भी हूँ और गायक मुकेश माथुर साहब को बचपन से ही फॉलो करता हूँ।
गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगतमुच्यते
सुव्यवस्थित ध्वनि, जो रस की सृष्टि करे, संगीत कहलाती है। गायन, वादन व नृत्य तीनों के समावेश को संगीत कहते हैं।
गीत, वाद्य और नृत्य तीनों के संगत से संगीत की व्युत्पत्ति होती है, संगीत हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण है। और यह हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है।
संगीत सिर्फ मनोरंजन के लिए ही नहीं सुना जाता है। वरन इसके कई शरीरिक लाभ भी हैं। अब संगीत का प्रयोग वैज्ञानिक अनेक रोगों के उपचार के लिए भी कर रहे हैं। भारत में सांस्कृतिक काल से लेकर आधुनिक युग तक आते-आते संगीत की शैली और पद्धति में जबरदस्त परिवर्तन हुआ है। भारतीय संगीत के इतिहास के महान संगीतकारों जैसे कि स्वामी हरिदास, तानसेन, अमीर खुसरो आदि ने भारतीय संगीत की उन्नति में बहुत योगदान किया है जिसकी कीर्ति को पंडित रविशंकर महाराज, भीमसेन गुरुराज जोशी, पंडित जसराज, प्रभा अत्रे, सुल्तान खाँ आदि जैसे संगीत प्रेमियों ने आज के युग में भी कायम रखा हुआ है।

