बालोद। बेटियां अब समाज में बेटे से कम नहीं मानी जातीं। समय के साथ समाज की सोच और परंपराएं बदल रही हैं। जहां पहले केवल बेटे ही अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाते थे, आज बेटियां भी इस कर्तव्य को पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभा रही हैं। ऐसा ही प्रेरणादायक उदाहरण बालोद नगर के बूढ़ा तालाब मार्ग में देखने को मिला, जब जय श्रीवास्तव की बेटियों ने अपने पिता के अंतिम संस्कार की सारी रस्में विधि-विधान से पूरी कीं।
65 वर्षीय जय श्रीवास्तव, जो बूढ़ा तालाब मार्ग के निवासी थे, का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उनके परिवार में कोई बेटा नहीं था, बल्कि केवल दो बेटियां, पूजा और अर्चना श्रीवास्तव, थीं। इनमें से एक बेटी की शादी हो चुकी थी। पिता के निधन के बाद अंतिम संस्कार को लेकर समाज में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। लोग इस परंपरागत सोच में बंधे हुए थे कि यह काम बेटा ही करेगा। लेकिन दोनों बेटियों ने इन परंपराओं को तोड़ते हुए पिता को कंधा देकर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई।
परंपराओं को तोड़कर पेश की मिसाल
जय श्रीवास्तव की दोनों बेटियों ने समाज के सामने एक नई मिसाल पेश की। उन्होंने अपने पिता की अर्थी को कंधा देकर ताँदुला मुक्तिधाम तक पहुँचाया और अंतिम क्रिया संपन्न की। उनकी इस पहल को देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। सभी ने इस कदम को सराहा और समाज में बेटियों की बराबरी की जरूरत को महसूस किया।
जहां एक ओर बेटियों ने अपने पिता के प्रति प्रेम और कर्तव्य का उदाहरण दिया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने यह भी दिखाया कि बेटियां बेटों से किसी भी मामले में कम नहीं हैं। रिश्तेदारों और समाज के अन्य लोगों ने बेटियों के इस कदम को स्वीकार करते हुए उन्हें ढांढ़स बंधाया और समर्थन दिया।
बदलते समाज की तस्वीर
आज का दौर बेटियों का दौर है। वह हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, चाहे वह शिक्षा हो, खेल हो, सेना हो या फिर परिवार की जिम्मेदारी। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि समाज धीरे-धीरे बेटियों को समानता का दर्जा दे रहा है। बेटियां भी अब उन कार्यों को करने में सक्षम हैं, जिन्हें कभी केवल बेटों का अधिकार माना जाता था।
पूजा और अर्चना श्रीवास्तव ने न केवल अपने पिता को श्रद्धांजलि दी, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया कि परंपराओं में बदलाव जरूरी है। हर बेटी को यह अधिकार है कि वह अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा सके।
समाज के लिए प्रेरणा
जय श्रीवास्तव की बेटियों की यह पहल हर परिवार और समाज के लिए एक प्रेरणा है। इससे यह संदेश मिलता है कि बेटा या बेटी में फर्क करना अब प्रासंगिक नहीं है। समय के साथ सोच बदलनी चाहिए और बेटियों को भी समान अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए।
पूजा और अर्चना ने जिस तरह अपने पिता के प्रति प्रेम और सम्मान का परिचय दिया, वह अन्य बेटियों और समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह घटना दिखाती है कि बेटियां अब सिर्फ घर की लक्ष्मी नहीं, बल्कि समाज के लिए आदर्श बन रही हैं।

