खेत में लगी फसल बेडे की फसल
जशपुरनगर. ई-कॉमर्स कंपनियों के माध्यम से अब 300 रु. किलो खरीद रहे लोग
पहले उत्पादन हो गया था बंद, बड़े शहरों में डिमांड बढ़ी तो अब 400 हेक्टेयर मेें हो रही खेती
जिले के जनजातियों द्वारा उगाए जाने वाले अनाज में बेड़े प्रमुख रूप से शामिल है। करीब तीन दशक पहले इसका उत्पादन बड़े पैमाने में हाेता था। पहले इसे गरीबों का भोजन समझा जाता था लेकिन अब बेड़े या प्रोसो बाजरा की डिमांड मेट्रो सिटी में बढ़ रही है, क्योंकि इस अनाज पर हुए वैज्ञानिक रिसर्च से पता चला है कि यह शुगर फ्री राइस है। इसके सेवन से डायबिटीज कंट्रोल में रहता है और शरीर में उर्जा का स्तर अन्य अनाज के मुकाबले अधिक होता है।
जब से बेड़े को शुगर फ्री राइस के रूप में पहचान मिली है, इसकी कीमत भी कई गुना बढ़ गई है। यही वजह है कि अब जिले के पहाड़ी इलाकों में फिर से इसकी खेती शुरू कर दी है। इस वर्ष पंडरापाठ, सरधापाठ, सोनक्यारी व सन्ना इलाके में करीब 400 हेक्टेयर भू-भाग पर किसानों ने धान के बजाए बेड़े की फसल उगाई है। फसल के तैयार होने पर वे उसे बाजार में बेच सकेंगे।
ई-काॅमर्स कंपनियों में प्रोसो मिलेट नाम से बिक रहा
बेड़े को प्रोसो मिलेट के नाम से बेचा जा रहा है। ई-काॅमर्स कंपनियां इसे पैकेट बंद प्रोसो बाजरा या शुगर फ्री राइस के नाम से 250 से 300 रुपए किलो में बेच रही है। स्थानीय बाजार में यह आसानी से उपलब्ध नहीं होता है। इसलिए अधिकांश लोग ई-काॅमर्स कंपनियों के इसकी ऑनलाइन खरीदी भी करते हैं। ई-वेबसाइड्स पर शुगर फ्री राइस सर्च करने पर प्रोसो मिलेट के पैकेट्स सबसे पहले दिखाई पड़ते हैं। पहले इस अनाज का दाम मोटे चावल से भी सस्ता हुआ करता था, पर अब इसकी कीमत पतले चावल से भी ज्यादा हो गई है। प्रोसो बाजरा का उत्पादन करने वाले किसान इसे स्थानीय स्तर पर 70 से 80 रुपए किलो में बेच रहे हैं।
जहां पानी कम, वहां भी की जा सकती है खेती
कृषि वैज्ञानिक व वैदिक वाटिका के संस्थापक समर्थ जैन ने बताया कि प्रोसो मिलेट उच्च गुणवत्ता वाला मोटा अनाज है। यह विटामिन (नियासिन, बी-कॉम्प्लेक्स, फोलिक एसिड) खनिज व आवश्यक एमिनो एसिड की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है और यह टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को कम करता है। इसलिए डायबिटीज के मरीज इसे विशेष तौर पर शुगर फ्री राइस के रूप में उपयोग करते हैं। इसका उत्पादन में पानी की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती है और ना ही विशेष खाद व रसायनों की जरूरत पड़ती है। गर्म जगहों पर जहां पानी की साधन नहीं हैं, वहां इसकी खेती आसानी से हो सकती है।
कोरवाओं ने इस अनाज के अस्तित्व को बचाए रखा
वनवासी कल्याण आश्रम के हित रक्षा प्रमुख रामप्रकाश पाण्डेय ने बताया कि बेड़े को अकाल का भोजन भी कहा जाता है। जब अकाल पड़े और कोई दूसरी फसल का उत्पादन ना हो तब भी बेड़े आसानी से उगाए जाते थे। कोदो व कुटकी के जैसे ही बेड़े भी वनवासियों का पारंपरिक अनाज है। जैसे-जैसे समृद्धि आती गई, पतले चावल आए, बेड़े की पूछपरख कम होती गई। इसे गरीबों का भोजन समझा जाने लगा था।
किसानों को समृद्ध कर सकती है यह फसल
कृषि विभाग ने बेड़े के उत्पादन के लिए कोई योजना नहीं बनाई है। पर जिस स्तर से महानगरों के साथ विदेशों में इसकी डिमांड बढ़ी है, यह फसल किसानों को समृद्ध बनाएगी। बेड़े का उत्पादन करने वाले किसान रामकुमार का कहना है कि वे दो साल से इसकी खेती कर रहे हैं। कम लागत में बेहतर उत्पादन होता है। पहले एक साल उन्होंने इसे 30 से 40 रुपए किलो में बेचा था और दूसरे ही साल इसकी दोगुनी कीमत मिल रही है।
साभार: दैनिक भास्कर

