पूर्णिमा से हुई शुरुआत, 30 दिनों तक गांवों में मनाया जाएगा त्योहार
पत्थलगांव. छत्तीसगढ़ का पौराणिक एवं सबसे अधिक पारंपरिक त्यौहार छेरछेरा अंचल में धूमधाम से मनाया गया। पर्व का उल्लास अधिकांश ग्रामीण इलाकों में देखने को मिला है, जहां आदिवासी बाहुल्य के लोग अधिक मात्रा में निवास करते है। पुरानी मान्यता के अनुसार छेरछेरा आदिवासियों का प्रमुख त्योहार है। इस दिन बच्चे सुबह से ही हाथों में टोकरी थामे लोगों के घर के सामने जाकर धान मांगते नजर आए, जिसे यहां के आदिवासी भीख नहीं हक का नाम देते है। चंदागढ़ के पूर्व सरपंच रौशन साय पैकरा का कहना था कि छत्तीसगढ़ में 36 प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन छेरछेरा का त्योहार सामुदायिक, सद्भावना का प्रतीक है। इस त्योहार में कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता। यह पौष पुन्नी के नाम से प्रचलित है, क्योंकि पौष माह के पूर्णिमा के दिन से ही इस त्योहार काे आरंभ कर दिया जाता है, जो पूरे महीने के 30 दिनों तक लगातार जारी रहता है। रौशन पैकरा ने बताया कि लोग इस त्योहार को मनाने के लिए घरों की सफाई के अलावा अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों को नए कपड़े, बर्तन एवं चावल से बने अनेक प्रकार के पकवान भेंट करते है। इस त्योहार को मनाने की परंपरा आदिकाल से इसी रिवाज के मुताबिक चली आ रही है।
सुआ नृत्य का समापन
रौशन साय पैकरा ने बताया कि त्यौहार का आदिवासी पारंपरिक नृत्य सुआ, डंडा एवं डोंडकी नृत्य से समापन करते है। तमता मे स्थित केशला पाठ में जाकर माता पार्वती व भोलेनाथ की पूजा अर्चना कर खुशहाली की कामना करते है। छेरछेरा के दिन ग्रामीण इलाके में सुआ,डंडा एवं डोंडकी नृत्य की प्रस्तुति देते हुए आदिवासी युवक युवतियां भगवान भोलेनाथ एवं माता पार्वती को गांव मे आने का निमंत्रण देकर इस त्योहार को इनके नाम समर्पित करती है। उनका कहना था कि छेरछेरा के रोज ही ग्रामीण क्षेत्र में लोग बांस की कांठी बनाकर उसके ऊपर सवार होकर चलते है।
छेरछेरा का धार्मिक महत्व
प्रमुख ज्योतिषाविद पं.आनंद शर्मा छेरता के त्यौहार पर अपने तर्क बताते है। उनका कहना था कि छत्तीसगढ़ में यह पर्व नई फसल के खलिहान से घर आ जाने के बाद मनाया जाता है। यह उत्सव कृषि प्रधान संस्कृति मे दानशीलता की परंपरा को याद दिलाता है। यह छत्तीसगढ़ का मानस लोकपर्व के माध्यम से सामाजिक समरसता को सुदृण करने के लिए आदिकाल से मनाया जा रहा है,उन्होंने बताया कि छेरछेरा का त्योहार आदिवासी अंचल मे श्रद्धा एवं सांस्कृतिक रूप से मनाने की प्रथा आदिकाल से चली आ रही है।
साभार: दैनिक भास्कर

