कभी तो शाम ढले तुम जल्दी घर चले आना !
रूकी हुई कश्ती में ज़रा पंख लगा जाना !!
यूँ तो कई शाम उम्मीदों में गुजर जाती है !
तुम ना आओगे शाम ढलते ही मालूम था हमें !!
कभी तो शाम ढले तुम जल्दी घर चले आना !
गरम चाय साथ में पीने की चाहत पूरी कर जाना !!
पता नहीं क्यूँ ये दिल इंतज़ार करती चली जाती है !
उम्मीद में टकटकी लगाए बैठे है मालूम था हमें !!
कभी तो शाम ढले तुम जल्दी घर चले आना !
शाम सुहानी साथ बिताने की चाहत पूरी कर जाना !!
एतवार की शाम है फिर भी वही इंतज़ार की घड़ी है !
बस आस लगाए बैठे है यूँ ही मालूम था हमें !!
कभी तो शाम ढले तुम जल्दी घर चले आना !
शाम की तन्हाई में फ़ुरसत के पल साथ बीता जाना !!
यूँ रोज़ का इंतज़ार इस तरह ज़ुबा खामोशी पड़ी है !
आज की शाम भी यूँ ही बीत जायेगी मालूम था हमें !!


