“कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है।”
“संसार के कोष में ऐसा कोई भी रत्न नहीं होता जिसे शुद्ध पुरुषार्थ के द्वारा किए गये कर्मों से प्राप्त नहीं किया जा सके।” – औघड़ संत शिरोमणी बाबा प्रियदर्शी राम जी
*”चपुचाप बैठे रहने से यहां
कुछ भी प्राप्त नहीं होता है जो जैसा जैसा प्रयत्न करता हैउसे
वैसे फल की प्राप्ति होती है। जो प्रयत्न को ,पुरुषार्थ को छोड़
कर भाग्य पर भरोसा करके बैठते हैं वे स्वयं ही अपने शत्रु हैं। वे
अर्थ, धर्म, काम को नष्ट कर देते हैं। ऐसेलोग समझते है कि सब
कुछ भाग्य के अधीन है,जो कुछ होगा वह मिलेगा। भाग्य में नहीं
होगा तो नहीं मिलेगा। किंतु बंधुओं कटुसत्य तो यह है कि *”कर्म से
ही भाग्य का निर्माण होता है।” है यह प्रत्यक्ष दिखने सनुने में और
अनभुव करने में भी आता है। जो भी पुरुषार्थी लोग है कर्मठ लोग है,
ज्ञानी है उन्नति करने वाले वे लोग कभी भी भाग्य की प्रतिक्षा
नहीं करतेहै।” – उक्त उद्गार औघड़ संत शिरोमणी पूज्य बाबा श्री प्रियदर्शी राम जी द्वारा गुरुपूर्णिमा के अवसर पर अपने शिष्यों के लिए प्रसारित संदेश में अभिव्यक्त किया गया ।”*(अघोर सेवा संदेश जुलाई – अगस्त 2021 अंक 60 से उद्धृत)
अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करते हुए पूज्य श्री बाबाजी ने अपने शुभ संदेश कहा कि – “बधुंओ संसार के समस्त दुखों को क्षय करनेके लिये पुरुषार्थ ही एक मार्ग होता है। संसार के कोष में ऐसा कोई भी रत्न नहीं होता जिसे शुद्ध पुरुषार्थ के द्वारा किए गये कर्मों से प्राप्त किया नहीं जा सके। जो जिस पदार्थ के पाने की इच्छा करते हैं और उसे पाने का क्रमशः प्रयत्न करते हैं वे अवश्य ही उसे प्राप्त करते हैं यदि वे बीच में ही प्रयत्न करना नहीं छोड़ दें।”
पूज्य बाबाजी ने अपने शुभ संदेश में आगे कहा कि -” कल के बिगड़े
हुए काम को आज के प्रयत्न से सधुारा जा सकता है। उसी प्रकार
आज के किए गये अच्छे पुरुषार्थ से पूर्व के किए गये पुरुषार्थ
सधुारा जा सकता है। इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को क्रियाशील
होना चाहिए।और वर्तमान में अच्छे कर्म करके पवित्र कर्म करके
अपने पूर्व के किए गये पुरुषार्थ जाने अनजाने किए गये गलत
कर्मों को हमलोग सधुार सकतेहैं।
पूज्य बाबा जी पुरुषार्थ की व्याख्या करते हुए बतलाते हैं कि – पुरुषार्थ दो प्रकार का होता है एक शास्त्र अनसुार दूसरा
शास्त्र के विरुद्ध। पहले से परमात्मा की प्राप्ती होती है, दूसरे से
अनर्थ की प्राप्ती होती है। शास्त्र और सज्जन की संगति से
युक्त पुरुषार्थ का आश्रय लेकर बुद्धि और अतःकरण को
निर्मल करके संसार सागर को पार करना होता है।
जिसका अंतः करण निर्मल नहीं होता है वह न तो शास्त्र को
समझ पाता है ना ही गुरु के वाक्य को, आत्म अनुभूति होना
तो और भी कठिन होता है इसीलिए बधुंओ सज्जनों की
संगती से और शुभ कर्मों को करने सेउनकी बुद्धि सार तत्वों
को समझनेके योग्य हो जाती है। भोगों की वासनाओं के
त्याग देने पर इंद्रियों के कुत्सीत प्रयासों के रुक जानेपर
मन शांत हो जाता है तभी गुरु की शुद्ध वाणी मन में प्रविष्ट
करती है। जिस प्रकार से मलीन शीसे से मुख के प्रतिबिंब को
नहीं देखा जा सकता है उसी प्रकार से इच्छाओ कामनाओ
के वशीभूत संतोष रहित चित्त में ज्ञान का प्रकाश नहीं होता
है। जो संत महात्माओं के सत्संगती में जाता है सत्संग में
जाने से इस लोक में सत्मार्ग दिखलाई देता है। सत्संग इस
लोक में सत्मार्ग को दिखलाने वाला होता है। हृदय के
अंध कार को दूर करने वाला होता है और वह ज्ञान रुपी सूर्य
का प्रकाश होता है। हम सत्संग में जाते हैं अच्छे विचारों को
सनुते हैं तो हमें आनंद की अनुभूति होती है । किंतु वहां से
आते है तो हम उन विचारों को भूल जाते हैं। इसलिए हमें
जीवन में विचार चिंतन करने को कहा जाता है।
विचार चिंतन का अर्थ है जो विचार हम वहां सुनते हैं उनको घर में बैठ कर चिंतन मनन करें।
मैं कौन हूं? यह संसार कैसे उत्पन्न हुआ? जीवन मरण
कैसे होता है? इन सारी बातों का न्याय पूविक चिंतन
करना उन पर विचार करना हमारे जीवन के लिए परम
आवश्यक होता है। और इसी चिंतन से तत्व ज्ञान की
प्राप्ति होती है, तत्व ज्ञान की प्राप्ति सेआत्मा में शांति
प्राप्त होती है।
अघोर सेवा संदेश पत्रिका में प्रकाशित औघड़ संत शिरोमणी पूज्य बाबा श्री प्रियदर्शी राम जी के शुभ संदेश को राष्ट्रहित में जन कल्याणार्थ पाठकों हेतु उद्धृत कर रहे हैं। सदगुरुदेव जी के श्री चरणों में सादर समर्पित है।
“गुरु द्वारा प्रदत्त मत्रं केअभ्यास से विधाता द्वारा बनायी गयी रेखाएं मिटती है। दुर्निमित कट जाता है।”
- परम पूज्य अघोरश्वेर भगवान राम जी
गणेश कछवाहा
काशीधाम
बैकुंठपुर, बावलीकुंवा के पास
रायगढ़ छत्तीसगढ़।
94255 72284


