जशपुर. छत्तीसगढ़ के सबसे ठंडे इलाके पंडरापाठ में सेब की खेती का प्रयोग को कामयाब मान लिया है। जशपुर खूबसूरत पंडरापाठ इलाके 10 एकड़ में 1600 सौ पौधे लगाए गए है, जो आने वाले दिनों में पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा। जिले के पंडरापाठ के 100 एकड़ में सेब, नाशपती, गौठान और फ़ूड पार्क का निर्माण किया जा रहा है। इस ड्रीम प्रोजेक्ट को तीन साल पहले उद्यान विभाग संचालित करके पंचायत को हस्तांतरित कर दिया जागा। कृषि वैज्ञानिकों ने पंडरापाठ में बड़े पैमाने पर सेब की खेती के लिए वातावरण और जमीन को अनुकूल बताया है। जशपुर कलेक्टर महादेव कांवरे ने बताया कि इस साल 10 एकड़ में सेब के पौधे लगाए हैं। भविष्य में 100 एकड़ में सेब के पौधे लगाने की भी प्लानिंग है। अनुमान है कि दो साल बाद इन खेतों से सेब की पैदावार किसानों को मिलने लगेगी। प्रदेश में इस सेब को जशपुर सेब के नाम से जाना जाएगा। इंदिरा गांधी कृषि विवि के वैज्ञानिकों ने ठंडे प्रदेश में मिलने वाले फल जैसे सेव, नाशपाती, आडू (पीच), समेत अन्य की खेती प्रयोग के तौर पर शुरू की।
दो साल बाद फलों का बड़ा बाजार बनेगा जशपुर
ठंडे प्रदेश में पाए जाने वाले विभिन्न फलों के लिए जशपुर का मौसम अनुकूल है। वैज्ञानिकों के मुताबिक जशपुर के पाठ क्षेत्र के 100 एकड़ में सेब, नाशपाती, आलूबुखारा, किन्नो समेत अन्य पेड़ लगाए जाएंगे। सेब की ऐसी वैराइटी लगाई गई है, जिसमें ज्यादा ठंड की जरूरत नहीं होती है। हिमाचल, पंजाब, पूर्वी यूपी के कुछ क्षेत्रों में लगाई है। हिमाचल के बिलासपुर जिले में कम ऊंचाई में सेब की इस प्रजाति की खेती होती है। इसकी खेती के लिए समुद्र तल से ऊंचाई 1 हजार से 2500 से अधिक मीटर व तापमान 40 से 45 दिनों तक 8 डिग्री से कम होना चाहिए इसलिए यहां सेव लो चील वैराइटी लगाई गई और प्रयोग सफल रहा।
वातावरण अनुकूल… मैनपाट में भी हो सकती है सेब की खेती
विवि के अफसरों ने बताया कि यहां दो तरह के सेब लगाए जाएंगे। पहली वेरायटी में ठंड की अधिक आवश्यकता होती है। यह वैराइटी समुद्र तल से 4000 हजार से अधिक मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में लगाई जाती है, जहां दो महीने तक 4 डिग्री से कम तापमान रहे। इसे हाई चिल वैरायटी कहा जाता है। यह कश्मीर व हिमाचल के कुछ क्षेत्रों में लगती है। दूसरी यानी लो-चिल वैरायटी के लिए कम ठंड की जरूरत होती है। यह समुद्र तल से एक हजार से ढाई हजार फीट की ऊंचाई पर भी लग सकती है। मैनपाट का मौसम फल की खेती के लिए अनुकूल है।
साभार: दैनिक भास्कर

