आज स्धानीय अखबार के मुखपृष्ठ की सुर्खी ने बरबस ध्यान खींच लिया। शीर्षक था कमिश्नर ने कहा तरीक़े से बात करो वर्ना मै भूल जाउँगा। सभापति का जवाब था ये नगर निगम है और मैने भी चूडिय़ां नहीं पहनी। क्या मंशा थी ऐसा कहने के पीछे उनकी???
जिस निगम के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति ही चूडी पहननेवाली वाली हो, सभापति का ऐसा कहना उस महिला का ही अपमान है। ‘चूड़ी पहननाÓ मुहावरे का इस्तेमाल स्त्रियों को कमजोर बताने के लिए किया जाता है।उसी मुहावरे का इस्तेमाल ऐसी जगह किया जा रहा है जहां पच्चीस से तीस फीसदी महिलाएं अपने वार्ड का प्रतिनिधित्व करती हैं।सभापति जी शायद भूल गए कि वहां नेता प्रतिपक्ष भी एक महिला ही है और कुछ दिन बाद ही अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस भी आनेवाला है।एक जिम्मेदार पद पर रहते हुए खुद को ताकतवर बताने के लिए ऐसे घिसेपिटे मुहावरे की जरूरत तो बिल्कुल नहीं थी।वे शायद यह भी भूल गए कि विगत चुनाव मे जब उनका वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया था तो स्वयं उन्होंने अपनी पत्नी को प्रत्याशी बनाया था जो खुद भी चूडी पहनती है।हमारे देश मे चुडियां पहनने वाली अनगिनत महिलाएं हैं जिन्होंने पुरुषों की तुलना मे बेहतर कार्य किए और अपनी शक्ति और पराक्रम के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। दूर न जाकर वे खुद अपनी पार्टी को देखे जिसका नेतृत्व भी वर्षों से एक चूडी पहनने वाली ही कर रही है।
चूडिय़ां कमजोर नहीं होती सभापति महोदय…..
इस बीमार मानसिकता से उबरे और इस भ्रम को अपने जेहन से निकाल दे तो बेहतर होगा कि चूडिय़ां पहनना कमजोर होने की निशानी होती है शायद इसलिए मर्द चूडी नहीं पहनते।
आशा त्रिपाठी

