सुघ्घर रईगढ़ पहली बार ऐसा ग्लोशाइन बोर्ड देखा अपने शहर में, बड़ा सुकून मिला देखकर। किसे प्यार नहीं होता अपने शहर से। सच में इस तरह के आईडिया हम जैसे बांगडू लोगों के दिमाग में क्यों नहीं आते और ये बाहर से आए लोगों के दिमाग में कैसे एकाएक आते हैं भाई,जबकि शहर से उनका कोई निजी रिश्ता नाता नहीं होता।अपने कर्तव्यों को लेकर जो सजगता ये बाहरी लोग दिखाते हैं वही शहर में सालों साल से रह रहे लोगों को क्यों नहीं सूझता दरअसल अपने शहर को लेकर हमारा प्रेम बहुत सतही स्तर का है जिससे हम शहर से मिलने वाली तमाम सुख सुविधाओं की अपेक्षा तो रखते हैं लेकिन शहर को और अधिक सुंदर और सुव्यवस्थित बनाने का कोई दायित्व बोध हमें होता ही नहीं।हम इसे पूरी तरह शहर सरकार की जिम्मेदारी मान कर चलते हैं।इसीलिए हर 5 साल में अपने अपने वार्डो से शहर सरकार के नुमाइंदे चुनते हैं। यह नुमाइंदे कैसे चुने जाते हैं,क्या करते हैं और क्या नहीं करते अगले 5 साल तक हमारा इनसे कोई सरोकार नहीं होता महज अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के अलावे। नतीजतन हमारे ये नुमाइंदे निरंकुश हो जाते हैं। आमजन के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं रहती।अपने वार्ड के चंद चहेतों और प्रभावशाली लोगों को उपकृत कर वार्ड के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। यदि शहर के विकास और सौन्दर्यीकरण के प्रस्ताव ईमानदारी से लाया जाए और अमल किया जाए तो पैसों की कमी नहीं होती निगम में,लेकिन अफसोस कि ज्यादातर प्रस्ताव जनहित के बजाय अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए होते हैं और गडबडियाँ यहीं से शुरू होती हैं ।यहां यह बताना होगा कि पिछले कुछ महीनों में शहर में स्वच्छता, सुगम यातायात तथा विकास और सौन्दर्यीकरण को लेकर बहुत सी घोषणा की गई लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा शहर चौड़ीकरण के नाम पर तो यहां के रसूखदारो ने जिलाध्यक्ष का तबादला तक करवा दिया था। बहुत पुराना किस्सा नहीं है यह और अब फिर उसी तरह के किस्से की पुनरावृत्ति की आशंका बन रही है। आज के युग में भ्रष्टाचार और शिष्टाचार एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं। विवाद तक बात समझ में आती है जो भीतर भी सुलझाई जा सकती थी। उसे सार्वजनिक करने की बात समझ नहीं आती।इसे कब समझेंगे हम सुघ्घर रायगढियामन?

