आओ, मिलकर हिंदुस्तान बने।
जब हम पर जरूरत आन पड़ी, ख़तरे मे थी जान पड़ी,
तब हमने क्या ये सोचा था, और खुद से क्या ये पूछा था।
एबुलेन्स ले जाने वाला, डॉक्टर से मिलवाने वाला, ऑक्सिजन दिलवाने वाला, प्लाज्मा चढवाने वाला और खाना भिजवाने वाला, लाशों को दफनाने वाला, लाशे जलाने वाला, कितना ही ज्यादा नेक था वो, हम मे से कोई एक था वो, नाम हमे मालूम न था डिकोस्टा, सिंह या शेख था वो।
हम सारे जब परेशान थे न, उस वक़्त तो हम इंसान थे न,
एक दूसरे के साथ थे हम, मिलकर हिंदुस्तान थे हम।
अब नेताओं के लड़वाने से, मीडिया के भड़काने से, झूठी-मूठी अफवाहों के चक्कर मे आ जाने से, हम क्यूँ बंटवारा करते हैं, मेरा या तुम्हारा करते हैं। बेवजह आपस मे लड़कर, गलती ये दोबारा करते हैं।
अब हमको ये ठानना है, सब को ही अपना मानना है, हिन्दू मुस्लिम, ईसाई-सिख, सब एक ही है, ये जानना है. एक दूसरे की जान बने, इस मुल्क की हम शान बनें, बहुत हुआ हिन्दू-मुस्लिम, आओ मिलकर हिंदुस्तान बने ।


