आतंकवाद और भारतीय मुसलमान
अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन अल-कायदा ने भारत में तनाव भरे वातावरण में जहर घोलने के मकसद से हजरत मोहम्मद पर की गई कथित टिप्पणी द्वारा माहौल खराब करने की कोशिश की । अल-कायदा ने खुले तौर पर हिन्दुओं को आत्मघाती व्यक्तियों के द्वारा बम से मरवाने की धमकी देते हुए कहा कि वे अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मासूम बच्चों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इस आतंकवादी संगठन ने मृतप्राय हुए ‘गजवा-ए-हिन्द’ के सिद्धांत का जिक्र कर इसे पुनर्जीवित करने की कोशिश भी की। इस तरह के वक्तव्य देकर अल-कायदा ने उम्मीद लगाई होगी कि वे ऐसा करके भारत में हिंसा फैला देंगे और मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर बहरहाल, तथा मनगढ़ंत बातें बनाकर उनमें अपनी पैठ बना लेंगे। ऐसा वक्तव्य जारी करते हुए अल-कायदा भारतीय मुसलमानों का शांतिप्रिय अतीत तथा यहां की मिश्रित संस्कृति को भूल गया। इस धमकी भरे पत्र के जारी होने के कुछ समय भारतीय लोकसभा के एक मुस्लिम सदस्य ने इसकी आलोचना करते बाद ही हुए कहा कि “हमारे हजरत मोहम्मद साहब का अपमान किया गया है किन्तु हमें अल-कायदा जैसे आतंकवादियों की पैरवी करने की ज़रूरत नहीं है। अल्लाह इन ख्वारिज़ों से हमारे देश की हिफाजत करेगा जो हिंसा फैलाते हैं और इस्लाम का नाम बदनाम करते हैं। सबको पता होना चाहिए कि इस्लाम आतंकवाद की भर्त्सना करता है।” जिन्हें यह बात नहीं पता, उन्हें बता दें कि ख्वारिज उन लोगों का समूह है जिनकी वजह से पूरी दुनिया मुश्किलें झेल रही हैं। यह स्वारिज़ ही हैं जो खलीफा उस्मान और आगे चलकर खलीफा अली की मौत के जिम्मेदार बनें। भारतीय मुसलमान इन ख्वारिजों और अल-कायदा जैसे संगठनों की साजिशों से पूरी तरह वाकिफ हैं। भारत के किसी भी प्रमुख मुस्लिम संगठन जैसे जमीयत उलेमा हिन्द’ या ‘जमात-ए-इस्लाम ने अल-कायदा के इस धमकी भरे पत्र का समर्थन किया बल्कि कई मुस्लिम नेताओं और सोशल मीडिया पर अल-कायदा इन बयानों की निंदा की। इन के बुद्धिजीवियों ने सभी के संदेशों में एक समान प्रतिक्रिया थी। हजरत मोहम्मद साहब की शान में अपशब्द कहने का मसला भारत का अंदरूनी मसला है और इसे हमें खुद ही सुलझा लेंगे। हमें किसी बाहरी ताकत की दखलअंदाज़ी मंजूर नहीं है। यह पहली बार नहीं कि अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों ने भारत में अपने पैर फैलाने की असफल कोशिश की। 80 के दशक में हजारों की संख्या में मुसलमान, रूस व अफगानिस्तान के बीच चल रहे युद्ध में ‘जिहाद’ के नाम पर अल-कायदा संगठन में भर्ती हो गए थे। किन्तु, भारतीय मुसलमानों ने ऐसी आतंकवादी गतिविधियों से स्वयं को दूर रखा। जब ISIS द्वारा ‘खलीफा राज’ के लिए वैश्विक आह्वान किया गया तो करोड़ों मुसलमानों की संख्या में से लगभग 200 ने ही अपनी प्रतिक्रिया दी। बाद में पता चला कि सिर्फ 25 से कम ही मुसलमान सीरिया में युद्ध करने गए जबकि अन्य 25 खोरासन में इस मंशा से पलायन कर गए कि वे इस्लामी-राज’ में रहेंगे। बाकी सभी ‘ऑनलाइन गतिविधियों में व्यस्त रहे। इस्लाम, भारत का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है जिसे यहां लगभग 14 प्रतिशत लोग मानते हैं। या कहे तो 2011 की जनगणना के अनुसार 17 करोड़ 22 लाख लोग इसे मानते हैं। इसका अर्थ है कि मुश्किल से 0.0001161 प्रतिशत मुस्लिम जनता ने ही ISIS में भर्ती होने के लिए यहां से पलायन किया। इसके अलावा, अल-कायदा में भर्ती होने वाले मुसलमानों की संख्या तो इस ऊपर दिए गए प्रतिशत से भी कहीं कम थी।
भाईचारे की बुनियाद पर बने अतीत, देश के प्रति प्रेम और इसकी अखण्डता और अक्षुण्णता के लिए मर मिटने का जज्बा लिए, भारत के मुसलमानों ने ‘जिहाद के पर होने वाली हिंसा को नाम हमेशा ही नकारा है। यह भारत के उस अनूठे इतिहास की वजह से हुआ है जिसके कारण एक अप्रतिम बहुसंख्यक संस्कृति का विकास हुआ च जिसे भारतीय संविधान तथा धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र ने बढ़ावा दिया। भारत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती और निज़ामुद्दीन औलिया जैसे सूफी संतों की ज़मीन है। अल-कायदा तथा अन्य आतंकवादी संगठनों को यह याद रखना होगा कि आज का भारत अशफाकउल्ला खां, चन्द्रशेखर आजाद जैसे असंख्य लोगों की शहादत तथा एपीजे अब्दुल कलाम तथा होमी जहांगीर भाभा जैसे वैज्ञानिकों के योगदान से बना है। इस नाजुक संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश में उन्हें असफलता ही हाथ लगेगी।

