22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ कहे जाने वाले बेसरन घाटी में हुए आतंकी हमले में जहां पूरा देश स्तब्ध रह गया, वहीं एक कश्मीरी युवक ने मानवता और साहस की ऐसी मिसाल पेश की, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। अनंतनाग निवासी 28 वर्षीय कपड़ा व्यापारी नजाकत अहमद शाह ने छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के 11 पर्यटकों की जान बचाकर अद्भुत साहस और इंसानियत का परिचय दिया।
हमले के वक्त चिरमिरी से आए चार दंपति – सुभाष जैन, हैप्पी बढ़वान, लकी पाराशर और टीटू अग्रवाल अपने तीन बच्चों के साथ बेसरन घाटी में घूम रहे थे। अचानक गोलियों की बौछार शुरू हो गई और अफरा-तफरी मच गई। इस भीषण स्थिति में नजाकत अली ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने बच्चों को अपनी पीठ और गोद में उठाया और सभी को फायरिंग क्षेत्र से निकालकर पार्किंग स्थल तक सुरक्षित पहुंचाया।
इस हमले में नजाकत के सगे मामा आदिल हुसैन शाह की गोली लगने से मौत हो गई, लेकिन नजाकत ने अपने व्यक्तिगत शोक को पीछे छोड़ते हुए पहले दूसरों की जान बचाना जरूरी समझा। उन्होंने श्रीनगर एयरपोर्ट तक सभी 11 लोगों को सुरक्षित पहुंचाया, जिससे वे समय रहते अपने घर लौट सके।
नजाकत पिछले 15 वर्षों से बलरामपुर-रामानुजगंज और चिरमिरी सहित सरगुजा संभाग में सर्दियों के दौरान गर्म कपड़े बेचने आते हैं। उनके पिता भी करीब 30 वर्षों से यही काम करते थे। इस दौरान नजाकत ने सरगुजा के कई परिवारों से आत्मीय रिश्ते बना लिए थे। यही वजह है कि हमले के समय जब छत्तीसगढ़ के लोगों पर संकट आया, तो नजाकत उनके लिए एक ‘फरिश्ता’ बनकर सामने आए।
राकेश परासर, जो कुलदीप स्थापक के मामा हैं, ने कहा, “अगर नजाकत नहीं होते, तो आज हम सबके परिवार उजड़ चुके होते। उन्होंने जो किया, वो शब्दों से परे है।”
नजाकत की बहादुरी ने न केवल जानें बचाईं, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द और इंसानियत की सच्ची मिसाल भी पेश की। बलरामपुर और कश्मीर दोनों जगह उनकी सराहना हो रही है। छत्तीसगढ़ प्रशासन और स्थानीय नागरिकों ने भी उनके इस साहसिक कार्य को सलाम किया है।
इस घटना ने यह साबित कर दिया कि धर्म, जाति या राज्य से परे जाकर इंसानियत सबसे ऊपर होती है। नजाकत अली की बहादुरी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

