छत्तीसगढ़ का धमतरी जिला, जो सरप्लस बिजली के लिए जाना जाता है, में कई ऐसी ग्राम पंचायतें हैं जहां के आदिवासी समुदाय आज भी चिमनी की रोशनी में जीवन यापन कर रहे हैं। ओडिशा सीमा से सटे बोरई, लिखमा, घुटकेल एवं मैनपुर जैसे गांवों में लोग आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं से वंचित हैं। ग्रामीणों की यह निराशा इस बात को दर्शाती है कि राज्य सरकार की दावों के बावजूद, वास्तविकता कुछ और ही है।
समस्याओं का अंबार
ग्रामीणों ने कई वर्षों से बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवाओं और पक्की सड़कों जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग की है, लेकिन प्रशासन की ओर से केवल आश्वासन ही मिलते रहे हैं। बच्चों को लो वोल्टेज के कारण चिमनी की रोशनी में पढ़ाई करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इससे न केवल उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है, बल्कि उनके भविष्य पर भी गंभीर खतरा मंडराता है। इन गांवों में विकास की कमी से लोग आक्रोशित हैं और उनकी उम्मीदें धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं।
लड़ाई की तैयारी
ग्रामीण अब अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने संघर्ष समिति के बैनर तले अपनी मांगों को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने का प्रयास किया है। हाल ही में आयोजित एक बैठक में सभी चारों ग्राम पंचायतों के ग्रामीणों ने अपनी समस्याओं को लेकर प्रस्ताव पारित किये हैं। उनकी मांगों में बिजली, पानी, सड़क मरम्मत और स्वास्थ्य सुविधाएं शामिल हैं।
चक्का जाम की चेतावनी
बोरई संघर्ष समिति ने ओवरलोड वाहनों के कारण खराब हो चुकी सड़कों को लेकर भी प्रशासन से शिकायत की है। ग्रामीणों का कहना है कि भारतमाला परियोजना के तहत चलने वाली ओवरलोड गाड़ियों ने उनकी सड़कों की हालत खराब कर दी है। इससे गांव में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ गई है। प्रशासन द्वारा इन समस्याओं के समाधान में कोई कदम नहीं उठाए जाने पर ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को अनसुना किया गया, तो वे सड़क पर उतरकर चक्का जाम करेंगे।

