बिलासपुर/गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर में अस्पताल की महिला गार्ड को महिला मरीज को इंजेक्शन लगाते हुए देखा गया। इस गंभीर लापरवाही पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई और जिला कलेक्टर गरियाबंद से व्यक्तिगत शपथपत्र के साथ विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बी.डी. गुरु की डिवीजन बेंच ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेकर जनहित याचिका के रूप में सुनवाई की। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा—“यह जीवन से खिलवाड़ है। अस्पतालों में इस तरह की घटनाएं बेहद खतरनाक हैं। अगर मरीज की जान चली गई तो जिम्मेदार कौन होगा?” न्यायालय ने इसे चिकित्सा नैतिकता और पेशेवर मानकों का गंभीर उल्लंघन बताया और राज्य सरकार से पूछा कि ऐसी घटनाएं आखिर क्यों हो रही हैं।
घटना का पृष्ठभूमि
मामला तब सामने आया जब एनआरएचएम कर्मचारियों की हड़ताल के बीच जिला अस्पताल में स्वास्थ्यकर्मी अनुपस्थित थे। इसी दौरान एक महिला मरीज को दवा देने के लिए किसी प्रशिक्षित स्टाफ की जगह महिला गार्ड ने इंजेक्शन लगा दिया। अस्पताल में मौजूद पूर्व पार्षद ने इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया, जो तेजी से वायरल हो गया। इसके बाद आम जनता और स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया।
शासन का जवाब और हाईकोर्ट का निर्देश
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान शासन की ओर से बताया गया कि संबंधित मामले में सीएमएचओ और सिविल सर्जन को नोटिस जारी कर दिया गया है। इस पर चीफ जस्टिस ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि केवल नोटिस जारी करना पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने जिला कलेक्टर गरियाबंद से व्यक्तिगत शपथपत्र मांगा है, जिसमें घटना का पूरा ब्यौरा और भविष्य में ऐसी चूक रोकने के लिए उठाए गए कदमों का उल्लेख करना अनिवार्य होगा।
जनता का भरोसा कमजोर
न्यायालय ने टिप्पणी की कि इस तरह की घटनाएं न केवल मरीजों की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, बल्कि सरकारी अस्पतालों पर जनता के भरोसे को भी गहरा आघात पहुंचाती हैं। अदालत ने कहा कि दोषी अधिकारियों की स्पष्ट जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाना जरूरी है।
मामले की अगली सुनवाई 28 अगस्त को निर्धारित की गई है।

