जांजगीर-चांपा. सूर्य उपासना के चार दिवसीय महापर्व छठ पर्व की विशेषता है कि न तो किसी मंदिर में पूजा के लिए कोई जाता है और न ही कोई मंत्र है, न जाप है न छुआछुत है। एक ही जल स्त्रोत में विभिन्न जाति वर्ग के लोग एक साथ पर्व मनाते हैं। इस व्रत में भक्त और भगवान के बीच कोई तीसरा माध्यम नहीं होता। शुक्रवार को छठ व्रतियों ने अस्ताचलगामी भगवान भुवन भास्कर को अर्घ्य दिया। शनिवार की सुबह उदित होते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत की पूर्णता होगी। पुत्र प्राप्ति, समृद्धि एवं मंगलकामना के पर्व छठ पर शुक्रवार की शाम हसदेव नदी के छठ घाट, नैला के रामप्रसाद तालाब के किनारे, केराझरिया में डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दिया गया। कोरोना के कारण इस बार इस व्रत में भी दिखा। छठ पूजा करने वालों ने स्वयं ही इस बात का ध्यान रखा कि कहीं भीड़ न हो जाए। जांजगीर एसडीएम ने केराझरिया में केवल सौ लोगों को पूजा करने की अनुमति दी थी। इसलिए चुनिंदा लोग ही यहां पहुंचे। नैला के रामप्रसाद तालाब के पास भी व्रतियों को ही पूजा करने की अनुमति थी। प्रसाद भी वितरण नहीं किया गया। शाम को विधि-विधान से सूर्य देव की आराधना की। छठव्रतियों ने डूबते सूर्य एवं छठमाता की आराधना की। व्यावसायिक एवं अन्य कारणों से यहां आकर बस चुके बिहार व उत्तर प्रदेश के मूल निवासियों द्वारा मनाया जाने वाला यह पर्व धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ की संस्कृति में भी मिलता जा रहा है।
उगते सूरज की करेंगे पूजा
शनिवार को तड़के भी भुवन भास्कर को अर्घ्य दिया जाएगा। उगते हुए सूरज को अर्घ्य देने छठव्रती तड़के ही घाट पहुंचेंगे। इसके बाद छठव्रती अपना उपवास तोड़ेंगे। सुबह उगते सूरज को अर्घ्य देने के बाद ही व्रती अन्न-जल ग्रहण करेंगे।
साभार: दैनिक भास्कर

