अंबिकापुर. सरगुजा संभाग में हाथियों से हर साल करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा है तो हर दो तीन माह के भीतर हाथियों को जहर और करंट से मारा जा रहा है। जबकि जन जागरूकता पैदाकर इसे रोकने के लिए सरकारी अमले के अलावा एक निजी संस्था को महीने में 35 हजार से अधिक का भुगतान पिछले तीन सालों से किया जा रहा है। इसे प्रतिदिन का 1210 रुपए के हिसाब से पैसा दिया जाता है। इस पर वाइल्ड लाइफ सीएफ भी कह रहे हैं कि संस्था कोई एनजीओ नहीं है और न ही विभाग से कोई अनुबंध है। ऐसे में संस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। इन सबके बीच रेडियो से भी हाथी से बचाव के लिए जंगल में विचरण कर रहे हाथियों की जानकारी प्रसारित की जाती है, लेकिन उन इलाकों में जहां रेडियो सुना जाता है वहां भी लोग जागरूक नहीं हुए हैं, क्योंकि उन इलाकों में भी हाथियों से मौत हुई है। दैनिक भास्कर पड़ताल में पता चला है कि तीन साल पूर्व वाइल्ड लाइफ के तत्कालीन अधिकारी ने अपनी चहेती संस्था को बिना कोई रुचि की अभिव्यक्ति के तहत विज्ञापन निकाले हाथियों को लेकर जन जागरूकता फैलाने के नाम पर जिम्मा दे दिया।
5 साल में 24 हाथियों की हुई है मौत 100 से अधिक लोगों की जान गई
सरगुज़ा वनवृत्त में पिछले पांच साल में 24 हाथियों की मौत हुई है। वहीं 100 से अधिक लोगों को हाथियों ने कुचलकर मार डाला है। इतना ही नहीं हजारों एकड़ फसल को बर्बाद किया है। विभागीय आकड़ों पर नजर डालें तो पांच सालों में हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष बढ़ा है और इसकी सबसे बड़ी वजह जागरूकता का अभाव ही है। जब भी हाथी बस्ती से लगे इलाकों में आते हैं लोग हाथियों को दौड़ाने लगते हैं तो हुकिंग कर हाथियों को मार रहे हैं।
आईएफएस के रिटायर्ड होने के बाद भी जारी है दखलंदाजी
विभाग में हाथियों के उत्पात और हाथियों के प्रबंधन के नाम पर एक तत्कालीन अधिकारी ने सरकार को हवा हवाई वाली प्लानिंग कर करोड़ों का नुकसान पहुंचाया और उसका खास फायदा नहीं मिला। बता दें कि हाथियों के उत्पात को रोकने सोलर फेंसिंग, जंगलों में फलदार पौधे लगाना, कॉलर आईडी सहित कई प्लान हुए और उनमें जमकर पैसा बहाया गया है। विभाग के कुछ अधिकारी कहते हैं कि उस अधिकारी का अब भी विभाग में दखलंदाजी है।
व्यक्तिगत पेमेंट करते हैं, संस्था से विभाग का कोई करार नहीं है
वाइल्ड लाइफ सीएफ एसएस कंवर ने बताया कि हाथियों को लेकर संस्था को जागरूकता कार्यक्रम के लिए कहा जाता है, उसे 1210 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान होता है, इसका निर्धारण बिसेन साहब के समय ही हुआ था। एसडीओ उसके काम का मूल्यांकन करते हैं। संस्था एनजीओ नहीं है, उससे कोई करार भी नहीं है। व्यक्तिगत भुगतान करते हैं। पांच महीनों से भुगतान भी नहीं हुआ है।
सीएफ जिलों के डीएफओ के माध्यम से कराते हैं भुगतान
संस्था के पदाधिकारियों ने कुछ दिन गांवों में पहुंचकर लोगों के बीच जागरूकता कार्यक्रम किए लेकिन सवाल उठ रहा है कि आखिर किस आधार पर सीधे तौर पर एक संस्था को ये जिम्मा दिया गया और अब तक लाखों रुपए का भुगतान किया गया है। बताया जाता है कि वाइल्ड लाइफ सीएफ के द्वारा संस्था को जिलों के डीएफओ के माध्यम से भुगतान कराया जाता है।


